भोपाल के समन्वय भवन में बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष-2025 के मौके पर राज्य स्तरीय सम्मेलन हुआ। इसमें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि हमारी सरकार जनकल्याण के संकल्पों के साथ काम कर रही है। पंचायत से लेकर मंत्रालय तक पारदर्शितापूर्ण कार्य शैली के कारण अन्य क्षेत्रों के साथ सहकारी क्षेत्र भी समृद्ध हुआ है।
इस दौरान सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा- हम भाग्यशाली हैं कि हमको अपने प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सहकारिता के क्षेत्र में बड़े बदलाव दिख रहे हैं। नहीं तो सहकारिता के अंदर की दुनिया ऐसी है कि खग ही जाने खग की भाषा। इससे तो भगवान ही बचाएं।
मुख्यमंत्री ने कहा- मैं तो वर्षों से सहकारिता से जुड़ा रहा, लेकिन दूर भी रहा। किसी को निकालना है तो ये माया भी भगवान के अलावा सहकारिता के अधिकारी ही जानते हैं। कैसे निकालना है। किसी के 12 बजाना है तो समिति में सदस्य बनाकर जांच बैठा दो।
एमपी में भी दूध पर बोनस की दिशा में आगे बढ़ रहे सीएम ने कहा- गुजरात में दूध पर बोनस की जिस तरह व्यवस्था है, मध्यप्रदेश भी इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही मध्यप्रदेश में मत्स्य पालन के लिए काफी बड़ा क्षेत्र है और हाल ही में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में भी उद्योग क्षेत्र के साथ सहकारिता ने कार्य करने की पहल की है। मध्यप्रदेश में सहकारिता आंदोलन को गति दी जा रही है। मध्यप्रदेश में सहकारिता के विभिन्न आयामों पर कार्य किया जाएगा। आने वाले चार वर्ष में सहकारिता आंदोलन को नए मुकाम पर पहुंचाया जाएगा।
इस कार्यक्रम में सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग, अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल, डीपी आहूजा समेत सहकारिता, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी विभाग के अधिकारी मौजूद रहे।
परिपत्र जारी हो जाते हैं फिर भी दबाकर रखे जाते हैं CM डॉ. यादव ने कहा- सहकारिता में नई भावना लाए हैं। इसमें कई सारी चीजों को सरलीकृत किया है। आज कई सेवाओं और पुस्तकों का लोकार्पण और विमोचन किया। पहले तो कई तरह के परिपत्र छिपाकर रखते थे। कौन-कौन से परिपत्र निकल गए पता ही नहीं चलता था। मैं भी उस चीज का भुक्तभोगी हूं।
मुख्यमंत्री ने 1990- 92 का एक वाकया सुनाया। उन्होंने कहा कि उज्जैन में मुझे लगा कि एक सहकारी समिति बनानी चाहिए और लोगों को मकान देना चाहिए। मकान सस्ते बना दो तो सब ले लेंगे। उसमें क्या गलत है? हमने अपने स्तर पर सारी पंचायतें करने के बाद प्रस्ताव पूरा कर वल्लभ भवन में पहुंचाए।
पहले तो नीचे से ही बोलते रहे कि अभी हाउसिंग सोसाइटी का रजिस्ट्रेशन बंद है। हमने पूछा कि अगर हाउसिंग सोसाइटीज बन रही हैं तो रजिस्ट्रेशन क्यों बंद है? हमने कहा ठीक है बंद है तो देखते हैं। तुम तो कार्रवाई आगे बढ़ाओ।
मैं अफसरों के पास जाता। वो रोज दो नए कागज पकड़ा देते। मैं उन कागजों की पूर्ति करता। वो नए कागज पकड़ा देते। ऐसा करते हुए 8-15 दिन गुजर गए। मैं पूछता कि आप अच्छे से देख लो इसमें कोई कमी तो नहीं। मेरे सामने कहते कि ठीक है। मैं घर पहुंचता और दो कागज जमा करने का पत्र फिर भेज देते।
उज्जैन जैसा हाल वल्लभ भवन में भी मिला सीएम ने कहा- यह करते-करते मैं भोपाल तक आ गया। भोपाल आया तो वल्लभ भवन में उस समय शारदा नाम के कोई अधिकारी थे। मैं प्रस्ताव देते-देते वहां तक पहुंच गया। उसके बाद भी वही हाल।
मैंने पूछा कि कोई कागज की कमी हो तो देख लीजिए। फिर उन्होंने तीन-चार चिट्ठी पकड़ा दी कि यह कागज कम पड़ गए। सारी पूर्ति करने के बाद फिर पूछा तो उन्होंने फिर एक चिट्ठी घर भेज दी कि यह कमी है। फिर मैंने कहा कि यह क्या नाटक है? कैसी सहकारिता है?