हेल्थ इंश्योरेंस के बढ़ते प्रीमियम पर रोक लगाने की तैयारी में सरकार, जानिए क्या है प्लान

Updated on 20-11-2025 01:05 PM
नई दिल्ली: हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ रहा है। अब सरकार इस मामले में दखल देने की तैयारी कर रही है। ET के मुताबिक, सरकार ने इस मसले पर बीमा रेगुलेटर (IRDA), इंडस्ट्री के बड़े अधिकारियों और हॉस्पिटल ग्रुप्स के साथ बातचीत शुरू कर दी है। एक अधिकारी ने बताया कि कुछ सुझाव IRDA के पास भेजे गए हैं, अब अंतिम फैसला रेगुलेटर लेगा।
  1. क्या है तैयारी?
    अधिकारी का कहना है कि हेल्थ इंश्योरेंस के बेतहाशा बढ़ते प्रीमियम को कंट्रोल करने के लिए लिए सरकार बीमा कंपनियों पर प्रीमियम की ऊपरी सीमा (Cap) तय करने जैसे कड़े कदम उठाने पर विचार कर रही है। डिस्क्लोजर (जानकारी देने के) नियमों को सख्त करने की तैयारी है। सरकार बीमा कंपनियों के मैनेजमेंट खचों को भी कम करना चाहती है। इसके तहत एजेंटों को मिलने वाले कमिशन की सीमा तय की जा सकती है, जिससे कंपनियों की लागत घटेगी और इसका फायदा ग्राहकों को मिल सकता है।क्लेम की प्रक्रिया में होने वाली देरी और गड़बड़ियों को रोकने के लिए सरकार 'नैशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज' को बढ़ावा दे रही है। इसका मकसद क्लेम के पूरे प्रोसेस को डिजिटल, तेज और आसान बनाना है, ताकि ग्राहकों को परेशानी न हो।सरकार इस बात पर करीब से नजर रख रही है कि जीएसटी में हुई कटौती का लाभ बीमा कंपनियां पॉलिसीधारकों को दे रही है या नहीं।
  2. प्रीमियम महंगा क्यों?
    दरअसल, देश में इलाज का खर्च बहुत तेजी से बढ़ रहा है। अस्पतालों में इलाज के लिए महंगी मशीनों और टेक्नॉलजी का इस्तेमाल बढ़ गया है। बीमा कंपनियों का आरोप है कि कई बार अस्पताल जरूरत से ज्यादा बिल बना देते हैं। इन सब वजहों से बीमा कंपनियों पर क्लेम का बोझ बढ़ता है। वे ग्राहकों से ज्यादा प्रीमियम वसूलती हैं। अस्पतालों का कहना है कि बीमा कंपनियां या तो क्लेम देने में देरी करती हैं, या फिर बिल में बेवजह कटौती करती हैं।
  3. आम लोग परेशान क्यों?
    बीमा कंपनियों और अस्पतालों की मनमानी के बीच आम आदमी परेशान है। जब क्लेम लेने की बारी आती है, तो कई बार उन्हें उम्मीद से कम पैसा मिलता है या फिर क्लेम सेटलमेंट में काफी परेशानी होती है। Aon की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में मेडिकल महंगाई 2026 में 11.5% तक बढ़ने का अनुमान है। यह 9.8% के वैश्विक औसत से ज्यादा है।

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