जोड़ों में दर्द, सूजन और अकड़न को अक्सर सोरायटिक अर्थराइटिस की प्रमुख समस्याएं माना जाता है। लेकिन इस बीमारी का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक दर्द झेलना, थकान महसूस करना, त्वचा पर दिखाई देने वाले बदलावों के कारण असहज होना और रोजमर्रा के कामों में परेशानी होना व्यक्ति की मानसिक सेहत को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में कुछ लोगों को लगातार उदासी, चिंता या डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन, यह मान लेना कि हर व्यक्ति को डिप्रेशन होगा सही नहीं है। ऐसे में व्यक्ति के शारीरिक लक्षणों के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है।

सोरायटिक अर्थराइटिस क्या है और यह शरीर को कैसे प्रभावित करता है?

क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार सोरायटिक अर्थराइटिस एक क्रोनिक इंफ्लामेटरी बीमारी है, जो जोड़ों और कभी-कभी रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है। यह अक्सर सोरायसिस नाम की त्वचा संबंधी बीमारी के साथ दिखाई देती है, जिसमें त्वचा पर लाल, पपड़ीदार और खुजली वाले पैच बन सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते और कुछ लोगों में जोड़ों की समस्याएं त्वचा के लक्षणों से पहले भी सामने आ सकती हैं।
इस बीमारी में इम्यून सिस्टम गलती से शरीर के स्वस्थ टिशू पर प्रतिक्रिया करने लगता है। इससे जोड़ों में दर्द, सूजन, गर्माहट और अकड़न हो सकती है। उंगलियों या पैर की उंगलियों में पूरी तरह सूजन आना, एड़ी में दर्द और पीठ में अकड़न भी इसके संभावित लक्षण हैं। बीमारी की गंभीरता के अनुसार चलने-फिरने, सीढ़ियां चढ़ने, काम करने और रोज के सामान्य कामों में मुश्किल हो सकती है।

सोरायटिक अर्थराइटिस और डिप्रेशन के बीच बीच क्या कनेक्शन है?


एनसीबीआई के अनुसार सोरायटिक अर्थराइटिस और डिप्रेशन के बीच संबंध कई कारणों से हो सकता है। पहला कारण है लगातार दर्द और शारीरिक परेशानी। जब व्यक्ति को हर दिन जोड़ों में दर्द, सुबह अकड़न या थकान का सामना करना पड़ता है, तो उसकी दिनचर्या और मनोदशा प्रभावित हो सकती है। मनपसंद गतिविधियों में हिस्सा न ले पाना या बार-बार दूसरों की मदद लेनी पड़ना भी निराशा बढ़ा सकता है।

नेशनल सोरायटिक फाउंडेशन के अनुसार बीमारी का भावनात्मक और सामाजिक असर मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते है। त्वचा पर दिखाई देने वाले बदलावों के कारण कुछ लोगों को शर्मिंदगी, भेदभाव या दूसरों की प्रतिक्रिया का डर हो सकता है। इससे वे सामाजिक मेलजोल कम कर सकते हैं और अकेलापन महसूस कर सकते हैं। नींद की परेशानी और लगातार थकान भी मूड पर असर डाल सकती है।

इंफ्लेमेशन और मेंटल हेल्थ में क्या संभावित संबंध है?

एनसीबीआई के अनुसार सोरायसिस अर्थराइटिस में शरीर के इम्यून सिस्टम और इंफ्लेमेशन यानी सूजन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वैज्ञानिक यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन और डिप्रेशन के बीच क्या संबंध है। कुछ शोधों में इंफ्लामेटरी कैमिकल्स, जिन्हें साइटोकाइन्स (Cytokines) कहा जाता है, और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंध सामने आया है। ये कैमिकल्स शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, इस संबंध को अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। डिप्रेशन का कारण केवल इंफ्लामेशन नहीं होता। आनुवंशिक प्रवृत्ति, तनाव, नींद, लंबे समय का दर्द, सामाजिक परिस्थितियां और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सोरायटिक अर्थराइटिस में सूजन होने का मतलब व्यक्ति को डिप्रेशन जरूर होगा।

क्या डिप्रेशन सोरायटिक अर्थराइटिस की सेल्फ केयर रूटीन को प्रभावित कर सकता है?


एनसीबीआई के अनुसार डिप्रेशन किसी व्यक्ति के लिए अपनी बीमारी को नियमित रूप से मैनेज करना कठिन बना सकता है। जब मन लगातार उदास हो, ऊर्जा कम लगे या ध्यान लगाने में परेशानी हो, तो दवाएं समय पर लेना, डॉक्टर की अपॉइंटमेंट पर जाना, व्यायाम करना और संतुलित भोजन की आदत बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मरीज जानबूझकर अपनी देखभाल नहीं कर रहा; मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी उसकी क्षमता और प्रेरणा को प्रभावित कर सकती है।

दूसरी ओर, यदि सोरायटिक अर्थराइटिस के लक्षण नियंत्रित नहीं हो रहे हों, तो बढ़ता दर्द, थकान और नींद की समस्या मानसिक दबाव को और बढ़ा सकती है। इस तरह शारीरिक और मानसिक समस्याएं एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं।

Psoriatic Arthritis का असर केवल जोड़ों और त्वचा तक सीमित नहीं रहता; यह व्यक्ति की भावनात्मक सेहत को भी प्रभावित कर सकता है। लंबे समय का दर्द, थकान, नींद की परेशानी और इंफ्लेमेशन से जुड़े संभावित जैविक कारण डिप्रेशन के साथ संबंध रख सकते हैं। हालांकि, यह संबंध जटिल है और इसके पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं होता। बीमारी के शारीरिक लक्षणों के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। समय पर डॉक्टर से सलाह, नियमित उपचार, भावनात्मक सहयोग और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद से दोनों स्थितियों को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है।