प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर मंगोलिया में श्रद्धालु करेंगे भगवान बुद्ध के परम शिष्यों के पवित्र अवशेषों के दर्शन

Updated on 27-05-2026 10:36 PM
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष पहल पर सांची स्तूप से भगवान बुद्ध के परम शिष्य श्री अरिहंत, श्री सारिपुत्र एवं श्री महामोद्ल्यायन के पवित्र अवशेष सार्वजनिक दर्शन के लिये मंगोलिया भेजे जा रहे हैं। राजाभोज विमान तल पर गुरुवार, 28 मई को इन पवित्र अवशेषों को राजकीय सम्मान के साथ विशेष विमान द्वारा नई दिल्ली के लिए रवाना किया जाएगा। पहल संस्कृति मंत्रालय (भारत सरकार), पर्यटन और संस्कृति, महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया और इंटरनेशनल बौद्ध कन्फेडरेशन (IBC) के संयुक्त समन्वय से आयोजित की जा रही है। इस ऐतिहासिक यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और मंगोलिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को प्रगाढ़ करना, साझा आध्यात्मिक विरासत को मजबूत करना और बौद्ध तीर्थ पर्यटन को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना है। यह पहल केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक विकास के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली में अवशेषों का सार्वजनिक दर्शन

अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व और सामान्य प्रशासन श्री शिव शेखर शुक्ला ने बताया कि नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में 29 मई को पवित्र अवशेषों को सार्वजनिक दर्शन के लिए रखा जाएगा। इस अवसर पर ‘महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया’ के पूज्य भिक्षु पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगे।

भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से 30 मई को मंगोलिया के लिए होंगे रवाना

पवित्र अवशेषों को 30 मई के दिन भारतीय वायुसेना के विशेष विमान के माध्यम से इन पवित्र अवशेषों को मंगोलिया के लिए रवाना किया जाएगा।इस पवित्र यात्रा के दौरान धार्मिक परंपराओं की पवित्रता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये मध्यप्रदेश पर्यटन और महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया का एक प्रतिनिधि दल अवशेषों के साथ रहेगा।

मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में 31 मई को पवित्र अवशेषों का होगा सार्वजनिक दर्शन

मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में 31 मई 2026 से शुरू होने वाली यह प्रदर्शनी अनुमानित रूप से 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं, भिक्षुओं और पर्यटकों को आकर्षित करेगी। इससे भारत के बौद्ध तीर्थ सर्किट, विशेषकर सांची जैसे स्थलों में वैश्विक रुचि बढ़ेगी और मंगोलिया की अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ाव भी और मजबूत होगा। भारत की बौद्ध विरासत को मंगोलिया जैसे बौद्ध परंपरा से जुड़े देश में ले जाकर यह भारत की “बौद्ध धर्म की जन्मभूमि” के रूप में भूमिका को और सशक्त करती है तथा अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ पर्यटन को बढ़ावा देती है।

मध्यप्रदेश के लिए महत्वपूर्ण अवसर

मध्यप्रदेश के लिए यह वैश्विक मंच पर अपने बौद्ध सर्किट को स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिससे विदेशी पर्यटकों की संख्या, प्रवास अवधि और सांस्कृतिक सहभागिता में वृद्धि होगी। यह पहल दोनों देशों के मठों, सांस्कृतिक संस्थानों और संग्रहालयों के बीच निरंतर सहयोग के नए मार्ग भी खोलेगी, जिससे साझा विरासत पर आधारित दीर्घकालिक सांस्कृतिक संबंध विकसित होंगे।

सांची स्तूप: यूनेस्को विश्व धरोहर और आस्था का वैश्विक केंद्र

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल 'सांची स्तूप' विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है।यहाँ संरक्षित पवित्र अवशेषों को भगवान बुद्ध के प्रतीक स्वरूप अत्यंत श्रद्धा और पूजनीय भाव से देखा जाता है। भगवान बुद्ध के दो प्रमुख शिष्य सारिपुत्र और महामौद्गल्यायन थे, जिन्हें बुद्ध का "अग्र युग्म" माना जाता था। सारिपुत्र को प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता) में और मौद्गल्यायन को अलौकिक शक्तियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। दोनों ही शिष्य बौद्ध संघ के अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ थे और उन्होंने धम्म के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई।इनकी शिक्षाएँ आज भी बौद्ध दर्शन और साधना परंपरा में अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण की जाती हैं।विशेष बात यह है कि सांची के 30 किमी के दायरे में कई ऐसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल मौजूद हैं, जो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं की गूंज आज भी संजोए हुए हैं।

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